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The statement does not come under the category of evidence under section 164 of the Code of Criminal Procedure Adhivakta Law Cafe

  यह एक से सुस्थापित विधि है कि बयान अंतर्गत धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता साक्ष्य की श्रेणी में नहीं आता। माननीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/ विशेष न्यायाधीश लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 (प्रथम) गौतम बुध नगर श्री निरंजन कुमार के द्वारा अभियुक्त शोएब खान को आरोप अंतर्गत धारा 363/366/376/328 भारतीय दंड संहिता व धारा 3/4 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के अपराध से दोषमुक्त करते हुए कहा कि न्याय का सिद्धांत यह है कि अपराधी को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए दंडित किया जाना आवश्यक है किंतु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को भी सजा न हो सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि अभियोजन पक्ष को अकाट्य साक्ष्य(ठोस सबूत) द्वारा घटना को साबित करना होगा। अपराध को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की ही होती है।  www.adhivaktalawcafe.com Factual background (तथ्यात्मक पृष्ठभूमि): वादिनी मुकदमा की पुत्री (पीड़िता) उम्र लगभग 14 वर्ष को उसके पड़ोस में रहने वाला शोएब खान पुत्र कयूम खान बहला-फुसलाकर भगा ले गया था। जिसके संबंध में मुकदमा अपराध संख्या 12

My family also victim of Judicial delay. #Justice_R_Bhanumathi


Justice R.Banumathi 

माननीय सुप्रीम कोर्ट की छठी महिला जज और सबसे बेहतरीन जजों में से एक जस्टिस आर भानुमति का सुप्रीम कोर्ट में आज आखिरी कार्य दिवस था । बार एसोसिएशन ऑफ़ सुप्रीम कोर्ट की तरफ से उनके लिए फेयरवेल पार्टी का आयोजन किया गया था । जिसमें जस्टिस आर. भानुमति ने कहा कि उनका जन्म तमिल नाडु के एक छोटे से गांव में हुआ था। 2 साल की उम्र में ही एक बस एक्सीडेंट में मैंने अपने पिता को खो दिया था। उनकी माताजी ने एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवज़े के लिए केस फाइल किया था और कोर्ट ने डिक्री ( आदेश ) भी पारित कर दिया । लेकिन प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि हम मुआवजा प्राप्त ही नहीं कर पाए। इस तरह हमारा परिवार खुद देरी से मिले न्याय का शिकार हो चुका है। जस्टिस आर. भानुमति ने अपने कार्यकाल में कई यादगार निर्णय दिए हैं । उन्होंने हमेशा ही नए अधिवक्ताओं को कठिन मेहनत करने और पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया । उन्होंने अपनी फेयरवेल स्पीच में यह भी कहा कि अगर उन्होंने कभी किसी अधिवक्ता की भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो उन्हें माफ करें । 1988 में 33 साल की उम्र में तमिलनाडु प्रदेश की हायर ज्यूडिशरी सर्विसेज HJS की परीक्षा पास कर उनका चयन जिला एंव सत्र न्यायाधीश के पद पर हुआ और उसके बाद 2003 में उन्हें हाई कोर्ट में जस्टिस के रूप में प्रोन्नत किया गया तथा 13 अगस्त 2014 से वे सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के रूप में अपनी सेवाएँ दे रही थी। आपको भविष्य के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाये। 

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