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The statement does not come under the category of evidence under section 164 of the Code of Criminal Procedure Adhivakta Law Cafe

  यह एक से सुस्थापित विधि है कि बयान अंतर्गत धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता साक्ष्य की श्रेणी में नहीं आता। माननीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/ विशेष न्यायाधीश लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 (प्रथम) गौतम बुध नगर श्री निरंजन कुमार के द्वारा अभियुक्त शोएब खान को आरोप अंतर्गत धारा 363/366/376/328 भारतीय दंड संहिता व धारा 3/4 लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के अपराध से दोषमुक्त करते हुए कहा कि न्याय का सिद्धांत यह है कि अपराधी को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए दंडित किया जाना आवश्यक है किंतु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को भी सजा न हो सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि अभियोजन पक्ष को अकाट्य साक्ष्य(ठोस सबूत) द्वारा घटना को साबित करना होगा। अपराध को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की ही होती है।  www.adhivaktalawcafe.com Factual background (तथ्यात्मक पृष्ठभूमि): वादिनी मुकदमा की पुत्री (पीड़िता) उम्र लगभग 14 वर्ष को उसके पड़ोस में रहने वाला शोएब खान पुत्र कयूम खान बहला-फुसलाकर भगा ले गया था। जिसके संबंध में मुकदमा अपराध संख्या 12

*Defamation.- Section 499 of Indian Penal Code*

*Defamation.- Section 499 of Indian Penal Code* Whoever, by words either spoken or intended to be read, or by signs or by visible representations, makes or publishes any imputation concerning any person intending to harm, or knowing or having reason to believe that such imputation will harm, the reputation of such person, is said, except in the cases hereinafter expected, to defame that person. *Essential elements in Defamation...* *Statement must be made* 👉 It should be published 👉 Should cause an injury 👉 Statement was false and incorrect factually 👉 It did not fall into privileged category *Types of Defamation: Slander vs. Libel* Slander pertained to spoken defamation and libel to written. Where defamatory statements published via radio, television or the internet fit into these categories is not a clear-cut matter. For now, it is easiest to think of slander as spoken defamation to a small audience (or just one other person) and libel as any written defamation orspoken or video

*”The first rule of criminal law

*”The first rule of criminal law that you need to understand is the fact that the law doesn't punish the commission of an Act.”* Therefore when A kills B, it may or may not be punishable by law. Depends a lot in the circumstances. What is punishable is not the act but the guilty mind. The law uses the words 'Mens Rea'. Therefore, the prosecution in order to get a conviction not only has to prove the commission of the crime by the accused but also the fact that he intended to do so. A lunatic may also kill someone, but that wouldn't be a murder because the lunatic doesn't intend to kill. the following could be called as the Exceptions or defenses to a charge of murder - *1. Self Defense -* If you kill a person in self defense, it is considered legal. The only rule here is that your defense should be proportional to the attack (your force should be equal / proportional to the force exerted by the aggressor). Which means if someone comes unarmed and assaults you, you c

If an officer in charge of a police station refuse to register an FIR. What to do then?

अगर पुलिस एफ आई आर दर्ज करने से मना कर दे। तब क्या करें ?  Adhivakta Law Cafe किसी भी संज्ञेय मामले की सूचना पुलिस को प्राप्त होने पर चाहे वह किसी भी माध्यम से प्राप्त हुई हो । पुलिस का कर्तव्य बनता है कि वह उस मामले में CR.P.C की धारा 154 के अन्तर्गत तुरंत एफ आई आर दर्ज कर, विवेचना शुरू कर दे और पीड़ित पक्ष की न्याय दिलाने में हरसंभव मदद करें । ऐसे संज्ञेय अपराध, जिसमें एफ आई आर दर्ज की गई है, उससे संबंधित सभी सबूतों को इकट्ठा करें एवं अभियुक्त को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करें । लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिस ऐसा करती नहीं है और अपने कर्तव्यों को भूल जाती है । ऐसी स्थिति में पीड़ित पक्ष के पास भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 ( सीआरपीसी ) की धारा 156 ( 3 ) के तहत यह अधिकार है कि वह माननीय न्यायालय के समक्ष एफ आई आर दर्ज कराने हेतु अपना प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकता है । यदि माननीय न्यायालय को यह समाधान हो जाता है कि ऐसा कोई संज्ञेय अपराध घटित हुआ है । जिसमें प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर उचित कार्रवाई की जानी आवश्यक है । तो माननीय न्यायालय पुलिस थाने के भार स

प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) है सबका अधिकार :-- शशिकांत भाटी एडवोकेट 30/05/2020

प्रथम सूचना रिपोर्ट ( First Information Report ) दर्ज करवाना हर पीड़ित का अधिकार है बल्कि पीड़ित ही नहीं एफ आई आर कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है यह अधिकार हमें दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 द्वारा प्रदान किया गया है। कोई भी ऐसी घटना जिससे कि किसी संज्ञेय अपराध का घटित होना पाया जाता है । उस स्थिति में पीड़ित या पीड़ित का कोई संबंधी या अन्य कोई समाज का व्यक्ति भी पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी ( SHO ) को लिखित रूप में या फिर यदि वह पढ़ा लिखा नहीं है, तो मौखिक रूप में भी सूचित कर सकता है। यदि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस थाने के भार साधक अधिकारी को मौखिक रूप में दी जाती है तब वह उसको लेख बंद्ध करेगा या फिर अपनेे अन्य किसी अधीनस्थ कर्मचारी को  लिखने निर्देश देेेेेेगा और ऐसी सूचना लिखने के बाद सूचना देनेे वाले व्यक्ति को पढ़कर सुनाई जाएगी । प्रत्येक ऐसी सूचना चाहेे वह लिखित रूप में दी जाए या मौखिक रूप में, उस पर सूचना देनेेेेे वाले व्यक्ति के  हस्ताक्षर अवश्य कराए जाएंगे और उसकी एक प्रतिलिपि निशुल्क प्रदान की जाएगी । एफ आई आर से संबंधित सभी फॉर्मेलिटीस पूरी हो जाने

Indian Evidence Act, 1872

INDIAN BARE ACTS Indian Evidence Act, 1872 PART I :   CHAPTER I :  PRELIMINARY 1. Short title, extent and commencement This Act may be called the Indian Evidence Act, 1872. 2 [It extends to the whole of India 3 [Except the State of Jammu and Kashmir] and applies to all judicial proceedings in or before any Court, including Courts-martial, 4 [other than Courts-martial convened under the Army Act.,] (44 & 45 Vict., c.58) 5[the Naval Discipline Act (29 & 30 Vict., c 109) or 6 [***] the Indian Navy (Discipline) Act. 19347] (34 of 1934) 8[or the Air Force Act] 7 Geo. 5, c. 51) but not to affidavits presented to any Court to any Court or Officer, not to proceedings before an arbitrator And it shall come into force on the first day of September, 1872. [2. Repeal of enactments: Repealed by the Repealing Act, 1938] 3. Interpretation clause In this Act the following words and expressions are use in the following sense. Unless a contrary intention appears from the context- “Court”- inclu

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